Dacoit Thakur Balwant Singh Bakhasar or Lieutenant Colonel Swai BHAWANI SINGH (IC-9015) The Parachute Regiment.

लेफ्टिनेंट कर्नल स्वाई भवानी सिंह (IC-9015) पैराशूट रेजिमेंट।



(पुरस्कार की प्रभावी तिथि- 5 दिसंबर 1971)

पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक

इस दिन 1971 में

10 पैरा एसएफ के कमांडो ने पाकिस्तानी क्षेत्र चाचरो में बहुत अंदर तक जाकर साहसिक हमला किया!


पैरा कमांडो का नेतृत्व

ब्रिगेडियर एच.एच. महाराजा सवाई भवानी सिंह

महावीर चक्र

कर रहे थे। हमले के दौरान भारतीय सेना को कोई नुकसान नहीं हुआ!

पाकिस्तान की सीमा में सैकड़ों किलोमीटर दूर रतक र दुश्मन के हौसले पस्त कर देने और कई शहरों को कब्जे में कर लेने के बाद छुट्टी मनाने जब जयपुर के पूर्व नरेश सवाई भवानीसिंह जयपुर लौटे तो सारा शहर उन्हें धन्यवाद देने खड़ा हो गया था।उस दोपहर सांगानेर हाई अड्डे से आमेर तक का सफर तय करने में इन्हें आधे दिन से ज्यादा समय लग गया। पहुंचने पर पहला काम इन्हें शिल्कदेवी के मंदिर में धन्य-प्रार्थना कर आशीर्वाद प्राप्त करना था, जैमा


कड़वाहा शासकों की परम्परा रही है। ने जब लेफ्टिनेन्ट कर्नत के पर


पर थे। वर्ष 1971 में भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांगलादेश) को स्वतंत्र होने में अभूतपूर्व सैन्य सहायता प्रदान कर विश्व को चौंका दिया था। पश्चिम सीमा पर पाकिस्तान ने पेटन टैंकों से पंजाब एवं राजस्थान में कई इलाकों पर आक्रमण किए जिनका माकूल जवाब देकर उन्हें ध्वस्त किया। भारतीय सेना दुश्मन के इलाकों में चुमती गई। बहुत कम लोगों को यह पता चला कि पांच महीनों से रेगिस्तानी क्षेत्रों में हवाई जहाजों से खाताधारी लड़ाकू योद्धाओं (पैरा दूपर सैनिक) को कुदाया जा रहा था और ऐसे प्रशिक्षण दिए जा रहे थे कि वे अंधेरे में पाकिस्तान के इलाकों पर कब्जा कर लें। भवानी सिंह तब भारतीय सेना के दसवीं पैरा रेजिमेंट' के शीर्ष अधिकारी थे और इस प्रशिक्षण का नेतृल कर रहे थे।

युद्ध से लौटने के बाद सवाई मानी सिंह के स्वागत में उमड़े लोग। पाइल पोटी सेना प्रमुख एसएच.एफ. जे. मानकला के इशारे पर इन्होंने हालाचारी सैनिकों की अगुवाई कर उस 'डेजर्ट ऑपरेशन की अगुवाई की और पाकिस्तान की सीमा में छाछरी नामक नगर पर आधी रात में ही कब्जा कर लिया। 'कृपा' और 'चारली' नामक दो अलग-अलग टुकड़ियों के जमीन पर कूदते ही सेना को 'जोगा जीपें खड़ी मिलती जिसमे गोला-बारूद एवं खाने का सामान रहता था। पांच दिन में इन सभी ने छाउरो के बाद वीरावाह, इस्लामकोट, नगरपारकर और अंत में लुनियों नामक नगरों पर तिरंगा इरण्डा फहरा दिया। यह इलाके बाड़मेर के दक्षिण-पश्चिम में थे और करीब 60 से 90 किमी की दूरी पर। इस कार्रवाई में पाक के 36 सैनिक मारे गए और 22 को युद्ध बन्दी बनाया गया। वीरोचित सम्मान देने के लिए पूरा देश उन दिनों मुद्ध से लौटने वाले सैनिकों के लिए पलके बिछाए हुए था। जयपुर में ले. कर्नल भवानी सिंह को दोतरफा आदर मिला। एक तो वे यहां के नरेश थे। दूसरे एक ऐसे सैन्य अधिकारी जिन्होंने छाताधारी सैनिकों की रेजिमेंट का नेतृत्व कर पाकिस्तान के कई शहरों को फतह किया। खुली जीप में खड़े होकर यह सैन्य अधिकारी बाजारों में खड़े नगरिकों से शाबाशी प्राप्त करते हुए बार-बार झुकते थे। हाथ जोड़कर लोगों को धन्यवाद दे रहे थे। जौहरी बाजार से इसकी जीप को आगे बढ़ने में सबसे अधिक समय लगा। इतनी लम्बी विजय यात्रा में जयपुर वासियों नेन तो तोरण द्वार बनवाए, न ही कोई बैनर या होर्डिंग लगवाए। ऐसा तब जीवन का अंग नहीं था। लोगों को एक साथ जुड़ने का संकेत कैसे मिला कि वे समूह में उमड़ पड़े और अत्यन्त अनुशासित बने रहे। 'राजस्थान पत्रिका में इस युद्ध के विजेड के लौटने की खबर एक दिन पहले प्रकाशित हुई थी। इतना बाफी था जयपुर शहर के उमड़ने के लिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सबाई भवानी सिंह ही एकमान नरेश थे जिन्होंने भारतीय सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद से सेक आरंभ की और बटालियन के कमाण्डर पद से स्वतः सेवानिवृत्ति प्राप्त की। इस लड़ाई में शौर्य, पराक्रम एवं नेतृत्व की श्रेहता के लिए इन्हें सरकार ने 'महावीर चक्र में सुशोभित किया। 22 अक्टूबर 1931 को जन्मे इस फाटू पर फौजी अफसर को ब्रिगेडियर का ओहदा भी सरकार ने प्रवन किया। इनका देहान्त 17 अप्रैल 2011 को हुआ। ऐसे सभी वीरों को पत्रिका का सादर अभिनन्दन, बार-बार।युद्ध से लौटने के बाद स्व. श्री सवाई भवानी सिंह जी के स्वागत में उमड़े लोग

5/6 दिसंबर 1971 की रात को, पैराशूट रेजिमेंट (कमांडो) की एक बटालियन की कमान संभाल रहे लेफ्टिनेंट कर्नल स्वाई भवानी सिंह अपने जवानों को लेकर दुश्मन के इलाके में अंदर तक घुस गए और चार दिन और रात तक, अपनी निजी सुविधा और सुरक्षा की परवाह किए बिना, चुचरो और विरवा में दुश्मन के कब्जे वाली चौकियों पर कुशलता से और लगातार छापे मारे। उन्होंने बहुत दृढ़ संकल्प और जोश दिखाया और भारी रासायनिक छोटे हथियारों की गोलाबारी के खिलाफ़ एक कठिन इलाके में शांत साहस और संयम के साथ अपनी कमान का निर्देशन किया। लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह के प्रेरित नेतृत्व और व्यक्तिगत साहस के कारण दुश्मन के इलाके के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया गया, जिससे दुश्मन के बीच दहशत और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई, जिससे उन्हें बड़ी संख्या में कैदियों और उपकरणों को छोड़कर पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस ऑपरेशन में लेफ्टिनेंट कर्नल स्व. भवानी सिंह ने भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप व्यक्तिगत साहस, नेतृत्व के असाधारण गुणों और कर्तव्य के प्रति समर्पण का उदाहरण पेश किया।



लेफ्टिनेंट कर्नल स्वाई भवानी सिंह व ठाकुर बलवंत सिंह बाखासर 

भारतवर्ष के क्रूरतम अत्याचारी, घोर शोषणकारी व सामंतवादी वर्ग विशेष के एक सामंत, पूर्व महाराजा जयपुर, ब्रिगेडियर भवानी सिंह (महावीर चक्र) तथा इसी वर्ग विशेष के एक कथित डाकू बलवंत सिंह ने आज ही के दिन भारत पाकिस्तान के बीच हुए 1971 के युद्ध में पाकिस्तान में 100 किलोमीटर तक अंदर घुसकर तिरंगा लहराया था।


कथित डाकू बलवंत सिंह भी उपरोक्त वर्णित सामंतवादी व क्रूरतम वर्ग विशेष की पुरातन परंपराओं के संवाहक रहे हैं। इसी वर्ग विशेष से कथित कुख्यात डकैत डूंगर सिंह- जवाहर सिंह व बल सिंह -भूर सिंह, बठोट-पाटोदा (सीकर) भी रहे थे।


विदित रहे कि डूंगर सिंह - जवाहर सिंह व बल सिंह - भूर सिंह ने न जाने कितने ही अंग्रेजों का अंत किया था तथा गरीब जनता में उनसे लूट कर छीना गया पैसा वितरित किया था । इन कथित अत्याचारी डाकुओं द्वारा लूटे गए धन को रास्ते में ही गरीब लोगों में उनके द्वारा वितरित करने एवं विभिन्न समाज की बेटियों का दहेज भरने की सत्य घटनाएं आज भी जन-जन में प्रचलित है।


बिकी हुई कलम के कलमकार कुंठित इतिहासकारों ने चाहे अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित इतिहास में इन्हें स्थान नहीं दिया हो, पर राजस्थान के शेखावाटी भू-भाग में आज भी इन शूरवीरो के लोकगीत प्रचलित है।


राजनीतिक षड्यंत्रो की स्याही से कलम भिगोकर हमारे यहां के इतिहासकारों ने बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से इतिहास लिखा है। अंग्रेजों तथा कतिपय राजनीतिक दलों से पोषित इन कलमकारो ने एक और घटिया कार्य किया कि इन्होंने देश के संस्कृत साहित्य में लिखे वृतांतो व चारण भाटों की पोथियों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया। ताकि भविष्य में समकालीन इतिहासकारों के तथ्यों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जा सके और हर विषय को भी विवादित बनाया जा सके ।

यहां मेरे द्वारा भी एक सवाल खड़ा किया जा रहा है कि काकोरी की ट्रेन लूटने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे तो फिर आगरा का किला व नसीराबाद की छावनी को लूटने वाले डूंगर सिंह- जवाहर सिंह आज भी डकैत कैसे हुए, कानून की भाषा में तो डकैती, डकैती ही होनी चाहिए ?




गर्व है ब्रिगेडियर भवानी सिंह व ठाकुर बलवंत सिंह बाखासर की वीरता पर ।


नोट- वैसे महाराणा प्रताप, महारानी पद्मिनी, दुर्गादास राठौड़, पृथ्वीराज चौहान जैसे अनेक वीरों पर सवाल खड़ा करने वाले लोग यहां भी सादर आमंत्रित हैं। चाहे तो यह कह सकते हैं कि परमवीर पीरू सिंह, परमवीर शैतान सिंह सहित ब्रिगेडियर भवानी सिंह व बलवंत सिंह बाखासर की यह दास्तान भी कपोल कल्पना है। परमवीर चक्र- महावीर चक्र तो गलती से दे दिए गए। वास्तविकता में तो यह वीरता के पुरस्कार उन्हीं के लोगों को मिलने चाहिए थे। और बड़ी बात नहीं है कि 50 साल बाद कोई यह भी कहने लग जाए कि यह सब वीर तो हमारे ही पूर्व पुरुष थे व हमारे ही समाज से थे, एक वर्ग विशेष इन्हें चुरा लिया था।जब डाकू बलवंत सिंह राणा ने पाकिस्तान के 100 से ज्यादा गांव हड़प कर भारतीय सीमा में मिला लिया था भारतीय राजा ) 1971 का युद्ध 3 दिसंबर से लेकर 16 दिसंबर के मध्य चला था। इस युद्ध मे जयपुर के राजा लेफ्टिनेंट कर्नल सवाई भवानी सिंह जी जानते थे कि उनकी सेना थार के मरुस्थल में भटक सकती है जबकि डाकू बलवंत सिंह इन सभी रास्तो तथा परिस्थितियों से वाकिफ़ है। अतः उन्होंने डाकू बलवंत सिंह से मदद मांगी, उस समय बलवंत सिंह पर डाका, हत्या तथा लूट जैसे दर्जनों केस चल रहे थे। बलबंत सिंह का आतंक भारत और पापिस्तान दोनों के सीमावर्ती इलाकों में था। बलवंत सिंह पाक सीमा के 100 किमी के दायरे से बहुत अच्छी तरह वाकिफ थे। महाराजा द्वारा प्रेरित करने पर डाकू बलबंत सिंह सेना की मदद करने को तैयार हो गया। लेकिन राजा भवानी सिंह के इस प्रस्ताव से राजस्थान के मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास सहमत नहीं थे। 

  ( किन्तु इन्दिरा गांधी ने शिमला समझौते में ये 126 गांव पाकिस्तान को Gift kar diya )

जय हिंद 🇮🇳

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