महान पराक्रमी, मारवाड़ के सपूत वीर शिरोमणि #दुर्गादास_राठौड़ जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

 


#मारवाड़_रियासत का एक ऐसा शेर
#वीर_शिरोमणि_स्वामिभक्त_दुर्गादास_राठौड़


 पुण्यतिथि पर  नमन....

##वीर_शिरोमणि_और क्षत्रियत्व_की_प्रतिमूर्ति##
                  ##दुर्गादास_राठौड़ ##

  #सादर नमन वीर क्षत्राणी माता नेतकंवर भटियाणी जी को #
  ऐसी कौनसी धरती होगी जिसकी माताएं पालने में झूलते अपने लालों को मातृभूमि की रक्षार्थ सर्वस्व होम करने की शिक्षा देती हो। माताओं की लोरियों में तो अपने लालों के लिए ऐशोआराम, सुंदर बहु, रमणीय खिलौने तथा खाने-पीने की स्वादिष्ट चीजों के उल्लेख होते हैं परन्तु राजस्थान की वीर नारी की लोरी सुनिए-

इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय।
पूत सिखावै पालणै, मरण बडाई माय।।
बेटा दूध उजाळयो, तूं कट पड़ियो जुद्ध।
नीर न आवै मो नयण, पण थण आवै दुद्ध।।  



ऐसी ही महनीय माताओं तथा प्रेरणास्पद पुत्रों के अनुकरणीय सुकृत्यों के परिणाम स्वरूप हमारी इस मरुभूमि को वीर-वसुंधरा एवं ‘रणबंका राजस्थान’ का विरुद मिला है। कहते हैं कि जहां बड़भागी लोग पैदा होते हैं, वहां सारे सुख-वैभव स्वयं ही चल कर आ जाते हैं और उनका लाभ सारी कायनात को मिलता है। पूरे वन में चंदन का पेड़ एक भी होता है तो खुशबू सबको मिल जाती है, उसी प्रकार से हमारी मातृभूमि को अपने सुयश की सुवास से महकाने वाले वरेण्य व्यक्तित्वों के त्याग एवं बलिदान के बल पर हम आज गौरवशाली अतीत के मालिक हैं-



    जोधपुर से १८मील उत्तर - पूर्व में सालवा गांव स्थित है। आसकरण जी इसी गांव के ठाकुर थे। इनकी तीसरी पत्नि नेतकंवर भटियाणी जी की कोख से वि. सं. १६९५को द्वितीय श्रावण शुक्ला चतुर्दशी सोमवार तदनुसार १३अगस्त १६३८ई.  को दुर्गादास राठौड़ का जन्म हुआ था। दुर्गादास की माता नेतकंवर फलौदी के जैमला गांव के भगवानदास रूपसिंह कैलण भाटी की पुत्री थी। नेतकंवर की सगी बुआ लालकंवर आसकरण जी की द्वितीय पत्नी थी तथा उनका विवाह नेतकंवर से करीब ९-१०वर्ष पूर्व हो चुका था।
नेतकंवर के साथ आसकरण के विवाह के बारे में यह लोकधारणा है कि वह बडी़ वीर थी। ऐसा
प्रसिद्ध है कि एक दिन गाँव में दो भैंसे आपस में
लड़ रहे थे। इससे रास्ता रुक गया था। वहाँ लोगो की भीड़ एकत्र हो गई। उधर से नेतकंवर
जल भर कर लौट रही थी। सिर पर घडा़ रखे ही
उसने रास्ते में लड रहे दोनों भैंसों के सींग पकड़कर अलग कर दिया सभी इस वीर बाला
के साहस और शक्ति को देख कर आस्चर्यचकित रह गये। उसके इस असाधारण शौर्यपदर्शन की चर्चा चारों ओर हुई। ठाकुर आसकरण ने अपनी द्वितीय पत्नी लालकंवर की भतीजी नेतकंवर की वीरता पर मुग्ध होकर इस वीर बाला के साथ तीसरा विवाह सन १६३४में किया था। विवाह के चार वर्ष पश्चात नेतकंवर के गर्भ से जिस बालक का जन्म हुआ वही आगे चलकर वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ के नाम से विख्यात हुआ।
  नेतकंवर भटियाणी एक वीर और स्वाभिमानी नारी थी। आसकरण जी के संयुक्त परिवार में वह अधिक दिन तक नहीं रह सकी। सालवा से चार मील दूर लूणावा (गांगाणी का) में ये दोनों मां बेटे रहने लगे। इस वीर माता ने अपने पुत्र को क्षत्रियोचित संस्कार व शिक्षा प्रदान की। वात्सल्यमयी माता नेतकंवर ने अपने पुत्र दुर्गादास राठौड़ में कर्तव्य पालन वीरता शौर्य त्याग उदारता जैसे उच्च आदर्शो व चारित्रिक गुणों का विकास किया जिससे आगे चलकर उसने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाकर एक उज्ज्वल इतिहास का निर्माण किया। धन्य है ऐसे देश सपूत व वीर शिरोमणि की यशस्विनी जननी नेतकंवर जिसने अपने पुत्र दुर्गादास राठौड़ को सुसंस्कारित कर इस योग्य बनाया।
    इसीलिए किसी कवि ने मातृशक्ति से दुर्गादास राठौड़ जैसे नवरत्न उत्पन्न करने की कामना को बडे़ ही खूबसूरत अंदाज में इस प्रकार प्रकट किया है - - - -
माई ऐहडा पूत जण, जेहडा दुर्गादास ।
बांध मुंडासो थांबियो, बिन थंबे आकास।।



##दुर्गादास_राठौड़_के_जीवन_की_एक_घटना_ और_महत्वपूर्ण_मोड़ - - - - -
(महाराजा जसवंतसिंह के दरबार में )।

    दुर्गादास का बचपन अपनी माता के सात्रिध्य में लुणावा  गांव में बिता। घर-परिवार और अपने पति के प्रेम से वंचित रहने के उपरान्त भी माता नेतकंवर ने दुर्गादास का पालन-पोशण बहुत स्नेह से किया। दुर्गादास को विरता ,साहस व निर्भीकता के संस्कार अपनी माता से जन्मजात विरासत में मिले थे।विर क्षत्राणी नेतकंवर ने नैनों के तारे दुर्गादास को अपनी भावनाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप ढाला। दुर्गादास में एक साथ कई आदर्शगुणों के समावेश का श्रेय उसकी माता को जाता है। माता ही बच्चे की प्रथम गुरु होती है और बच्चे के निर्माण में उसकी भुमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है तभी तो माँ के सपनों और आकांक्षाओं की सजीव अनुभूति उसके बच्चे में अभिव्यक्ति पाती है।
दुर्गादास लुणावा में अपना जीवन व्यतीत कर रहा था।उसी समय वि•सं•१७१२(१६५५ई•) में एक घटना घटी। इससे दुर्गादास के जिवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आता है। इस घटना ने दुर्गादास के जीवन और भाग्य दोनों को बिल्कुल ही बदल दिया।हुआ यह कि जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) के राज के रेबिरियों का ऊंटों का टोला उधर से गुजरा। वर्षा ऋतु के दिन थे। खेतों में सावणूधान (करीफ की सफल ),बाजरी,ग्वार मोठ आदि खेतों में लहलहा रहे थे। ऊंटों का वह टोला लुणावा के किसानों के खेतों में खड़ी फसल को उजाड़ रहे थे। गाँव के किसानों ने रेबारीयों को खेतों में खड़ी फसल नष्ट न करने का अनुरोध किया। पर रेबारीयों ने उसके अनुरोध को  अस्वीकार ही नहीं किया बल्कि उल्टे उनको पिटने लगे। इतने में दुर्गादास राठौड़ संयोगवश वहां आ पहूँचा। दुर्गादास ने रेबारीयों को खड़ी फसल में ऊंट चराने के लिए डांटा और फटकारते हुए कहा-‌‌‍" इन सिधे-सादे और बोले किसानों की खड़ी फसलें नष्ट करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती।"राजमद में मस्त उन रेबारीयों पर युवा दुर्गादास की बात का कोई असर नहीं हुआ। दुर्गादास की बात को हंसी ठिठोली में टालते हुए कहा-"ये सांढिये तो उस धोले ढुंढे वाले की
है यूं ही चरेगी।"
रेबारीयों के इस लापरवाही भरे वाक्य को सुनकर दुर्गादास का खुन खौल उठा। एक तरफ तो उसे इस बात का गुस्सा था कि वह जोधपुर के महाराजा के लिए'धोले ढूंढवाला' जैसी अपमानजनक शब्दावली का प्रयोग किया और दूसरा जिन फसलों को उसके गाँव के किसानों ने बड़ी मेहनत करके बोया और उगाया था। ये फसलों ही उन खेतिहर लोगों के जीवन का आधार थी। बेवजह उसको पशुओं द्वारा नष्ट किया जा रहा था। उसने एक बार फिर रेबारीयों को अपने उंट, किसानों के खेतों से निकिलने की बात कही पर इस बार भी उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। उल्टा उससे झगड़ने लगे।उनकी उदण्डत और अशीष्ट व्यवहार के कारण दुर्गादास राठौड़ को गुस्सा आया और उसने अपनी तलवार से रेबारी का सिर धड़ से अलग कर दिया। दुसरे सारे रेबारी वहाँ से उल्टे पांव भाग खड़े हुए। इस प्रकार किशोरावस्था में ही उसमें अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध करने का साहस व क्षमता विद्यमान थी।
यह बात जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के पास पहुँची। उन्होंने तुरंत उस बालक को अपने सम्मुख उपस्थित करने की आज्ञा दी। दुर्गादास महाराजा जसवंतसिंह के दरबार में उपस्थित हुए।वहाँ भरे दरबार में उसने बड़ी निर्भीकता से चरवाहे को मारने की बात स्वीकार करते हुए कहा-"महाराजा! चरवाहे ने मेरे गाँव के किसानों की फसलों को नष्ट करने के लिए खेतों में ऊंटों को खुला छोड़ दिया था और मना करने पर भी वे नहीं माने उल्टा हमसे ही झगड़ने को उतारू हो गये।उनका उद्दण्ड आचरण मुझसे सहन नहीं हुआ। मैंने अपने गाँव के किसानों पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए यह कदम उठाया। गांव के सीधे-साधे लोगों को परेशान करने वाले का अंत करना यदि कोई अपराध है तो मुझे दण्ड दीजिए मैं दण्ड का भागीदार हुँ।

महाराजा जसवंतसिंह दुर्गादास की निर्भीक व स्पष्ट बात को सुनकर बड़े प्रसत्र हुए।उस बालक की विरता,साहस और परदुख कातरता के भाव से वे बड़े प्रभावित हुए।
दुर्गादास उन्हीं (महाराजा जसवंतसिंह) के प्रधान आसकरण का तीसरा पुत्र है यह जानकारी महाराजा को बड़ी प्रसत्रता हुई।आसकरण ने अब तक दो पुत्रों का ही जिक्र कर रखा था। महाराजा के पुछने पर जब दुर्गादास ने बताया कि वह आसकरण का पुत्र है। इस पर महाराजा ने आसकरण को पुछा आपने अपने इस पुत्र की जानकारी हमें नहीं दी। क्या यह आपका पुत्र नहीं है? आसकरण ने महाराजा जसवंतसिंह को जवाब दिया-"ऐसा उदण्ड पुत्र कहलाने के योग्य नहीं है।कपुत बेटे से बिना बेटे का होना ही अच्छा है महाराज।"
इस पर महाराजा जसवंतसिंह ने कहा-"नहीं नहीं आसकरण। आपका सोचना बिल्कुल गलत है। आपका यह पुत्र कुपु्त नहीं सुपुत है।हम इसकी विरता, साहस, वाक्चातुर्यता, बुध्दिमता, निर्भयता व स्वाभीमानी प्रवृत्ति से बहुत प्रभावित हैं। इस घटना में इस किशोर का कोई दोष नहीं है। गलती ऊंट चराने वाले रेबारीयों की है।राज के नौकरों को गाँव के गरीब किसानों की फसल नष्ट करने का कोई अधिकार नहीं है। महाराजा जसवंतसिंह इस कथित अपराध से दुर्गादास को सम्मान मुक्त करके राजकिय सेवा में नियुक्त किया।

इसके बाद महाराजा जसवंतसिंह ने कहा"असकरण जी! आप जिसे कपुत कसकर अपना पुत्र होने से मना कर रहे हो देखना एक दिन वही इस प्रदेश की आशा की किरण बनकर मारवाड का नाम बढाएगा। मारवाड़ का यह शौर्य-पुत्र अपने शौर्य और पराक्रम से, समय आने पर मारवाड़ की रक्षा करेगा। इसमें कोई संशेय नहीं।"
  महाराजा जसवंतसिंह की पारखी नजर ने दुर्गादास में अंतर्निहित गुणों को देखकर जो भविष्यवाणी की वह बिल्कुल सत्य निकली। इसी भाव को राजस्थानी के एक दोहे में इस प्रकार प्रकट किया गया है - - - -
    घर रखवाळो गूदड़ा, जसवंत कहियो जोया।
    साची कीधी सोय, आसी आसकरण उत्त ।।

#जसवंत_कहियो_जोय, #गढ़_रखवाळो_गूदड़ा
#साची_पारख_सोय, #आछी_कीनी_आसउत।।
  दुर्गादास के भीतर छिपी प्रतिभा को महाराजा जसवंतसिंह ने पहली मुलाकात में पहचान लिया। सच ही कहा है कि आदमी के भाग्य और स्त्री के चरित्र के बारे में कोई नहीं जान सकता। मनुष्य के जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जो उसके जीवन की दिशा ही बदल देते हैं। इस घटना ने दुर्गादास के जीवन की दिशा ही बदल दी। प्रारब्ध अपना कार्य करता है, भाग्योदय होना होता है तो होकर ही रहता है। महाराजा जसवंतसिंह ने किशोर दुर्गादास के लिए जो भावना व्यक्त की वह आगे चलकर अक्षरशः सत्य निकली। समय आने पर दुर्गादास राठौड़ ने ही मारवाड़ की स्वतंत्रता और मारवाड़ के उत्तराधिकारी के प्राणों की रक्षा की।
   इतिहास साक्षी है मरुधरा के इस सपूत ने मातृभूमि मारवाड़ की प्राण पण से सेवा की। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लगभग तीन दशक तक एक अवधूत की भांति अलख जगाया। यह दुर्गादास राठौड़ के शौर्य और पराक्रम का ही परिणाम था कि अन्ततः मारवाड़ में पुनः राठौड़ साम्राज्य की सत्ता कायम हो सकी और मुगलिया शासन का अंत हुआ।
मात्र २०वर्ष की आयु में १६अप्रेल १६५८को उज्जैन के दक्षिण पश्चिम में स्थित धर्मत नामक स्थान पर शाहजहां की सेना एवं औरंगजेब व मुराद की संयुक्त सेना के बीच हुए युद्ध में शाही सेना की तरफ से महाराजा जसवंतसिंह के नेतृत्व में हुए संग्राम में दिखाया गया अद्भुत शौर्य दुर्गादास राठौड़ की शूरवीरता का आदर्श उदाहरण है। इस युद्ध में उनके एक के बाद एक लगातार चार अश्व मारे गये थे लेकिन वे युद्ध से विरत नहीं हुए और पांचवा घोड़ा लेकर तब तक युद्धरत रहे जब तक कि घायल होकर गिर नहीं गये और उन्हें महाराजा जसवंतसिंह के आदेश पर युद्ध के मैदान से हटा नहीं लिया गया।
  धरमत के इस में युवा दुर्गादास राठौड़ अपने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन कर रहा था। एक के बाद एक उसके चार घोड़े युद्ध में मारे गये। इसके बाद भी वह शत्रु दल पर कहर ढा रहा था।
  धरमत के युद्ध में दुर्गादास राठौड़ की अद्वितीय वीरता, अदम्य साहस, शौर्य, परम पराक्रम और शत्रु संहार के वीरोनमाद का वर्णन कवि कुंभकरण सांदू ने अपने रतनरासौ काव्य में किया है उसके भावों की एक झलक - - - - - -
  "वह उड़ उड़कर वहां पहुंच रहा था, जहाँ औरंगजेब और मुराद थे। उसकी तलवार शत्रु दल पर जुल्म ढा रही थी। उसकी तलवार, पाखर व कवच चमक रहे थे। वह घोड़ा हाथी मनुष्य जिस किसी पर शस्त्र चलाता उसी के दो टुकड़े हो जाते थे। उसने तत्काल जसवंतसिंह को बचाया। जीवन उसका हरिश्चंद्र सा है और साहस अद्भुत है। उसे गौरव सदा प्रिय है। वह जिस देश में पैदा हुआ वह नर-समुद्र कहलाया। यह हिन्दू बड़ा विचित्र है। सुल्तान ने कहा हिन्द देश का जो सरताज है जो असीम साहसी और अपने स्वामी का विश्वासपात्र सिपाही है,  वह जवां मर्द आ आसावत दुर्गादास है जो सोने में सुगंध जैसा है। "
युवा दुर्गादास राठौड़ ने उज्जैन के इस युद्ध में प्रबल पराक्रम से युद्धकर अपने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। उसकी वीरता से शत्रुदल अचंभित हो गया। मारवाड़ का यह शौर्य पुत्र महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम ) की सेवा में जीवनपर्यंत उपस्थित रहा। महाराजा के हर सामरिक अभियान में उनके साथ यह वीरवर उपस्थित रहा। महाराजा ने १७०००/- रूपये की रेख और ९गांव जागीर में प्रदान कर इस वीर का सम्मान किया।
  ## रूद्ररूप-रण-रीठ-में-सब-सूरां-सिरमौड़।
       मिणियां-मांय-सुमेर-ज्यूं-रंग-दुरगा-राठौड़।।

"गूंजे धरती और आकाश, अमर रहे राष्ट्रवीर दुर्गादास"
"आठ पहर चौसठ घड़ी, घुड़ले ऊपर वास !
शैल अड़ी तु सेक तो बाटी दुर्गादास !!"
"दुर्गादास को भर आनंद, सूरज समान चम चमा उठा!
बन महाकाल का महाकाल, भीषण भाला दम दमा उठा!!"
"गूंजे धरती और आकाश, अमर रहे राष्ट्रवीर दुर्गादास"

पत राखण प्रतपाळ री , गिंरा कियौ घरवास ।
सूरां तणो शिरोमणी , नाहर दुरगादास ।। १

दुरगां आसकंरण रा , घण मचाया घमसाण ।
जस जुगा नी जावसी , हद राखी हिन्दवाण ।। २

रीठ बजाई रांगड़ा , भुजावां भल अपाण ।
त्रास मिटावण तुरक री , दुरग आय दुनियांण ।। ३

कमधज धरियां कैद में , शाह ताळा जड़ाय ।
दिल्ली दुरगें दागळ करी , अजमल लियौ बचाय ।। ४

परतख निभाई प्रीतड़ी , रति नीं पाछौ रेह ।
सैंला खाक छाणंतो , सफरां त्यागी देह ।। ५

दुर्गा आसकरण रा अर नित उठ बागा जाय ।
अमल औरंगा उतरे आ दिल्ली धड़खा खाय

जरणी जणे तो ऐसा जणे जैसा दुर्गादास ।
मार मन्डासो राखीयो बिन थम्बे आकास ।।
क्षत्रिय वीर शिरोमणि और मारवाड़ के
#वीर_दुर्गादास_राठौड़  पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन 🙏🙏

#rajputana #mewar #marwar #veerdurgadas #DurgaDasRathore

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